
तद्यथाचाधिचिद्-द्रव्यदेशनाऽरम्यते मया ।
युक्त्यागमानुभूतिभ्यः पूर्वाचार्यानतिक्रमात् ॥28॥
अन्वयार्थ : ग्रन्थकार कहते हैं कि अब हम चेतन द्रव्य के विषय में ही व्याख्यान करेंगे । जो कुछ हम कहेंगे वह हमारी निज की कल्पना नहीं समझना चाहिये, किन्तु युक्ति, आगम, अनुभव और पूर्वाचार्यों के कथन के अनुकूल ही हम कहेंगे । इनसे विरुद्ध नहीं ।