
प्रागुद्देश्य: स जीवोस्ति ततोऽजीवस्ततः क्रमात् ।
आस्रवाद्या यतस्तेषां जीवोधिष्ठानमन्वयात् ॥29॥
अन्वयार्थ : पहले जीव-तत्त्व का निरूपण किया जाता है फिर अजीव तत्त्व का किया जायगा। उसके बाद क्रम से आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष का कथन किया जायगा । जीव का निरूपण सबसे प्रथम रखने का कारण भी यही है कि सम्पूर्ण तत्त्वों का आधार मुख्य-रीति से जीव ही पड़ता है । सातों तत्वों में जीव का ही सम्बन्ध चला जाता है।