+ जीव तत्त्व -
अस्ति जीव: स्वतस्सिद्धोऽनाद्यनन्तोप्यमूर्तिमान् ।
ज्ञानाद्यनन्तधर्मादि रूढत्वाद्-द्रव्यमव्ययम्‌ ॥30॥
साधारणगुणोपेतोप्यसाधारणधर्मभाक् ।
विश्वरूपोप्यविश्वस्थः सर्वोपेक्षोपि सर्ववित्‌ ॥31॥
असंख्यातप्रदेशोपि स्यादखण्डप्रदेशवान्‌ ।
सर्वद्रव्यातिरिक्तोपि तन्मध्ये संस्थितोपि च ॥32॥
अथ शुद्धनयादेशाच्छुद्धश्चैकविधोपि य: ।
स्याद्-द्विधा सोपि पर्यायान्मुक्तामुक्तप्रभेदतः ॥33॥
अन्वयार्थ : जीव द्रव्य स्वतः-सिद्ध है । इसकी आदि नहीं है इसीप्रकार अन्त भी नहीं है । यह जीव अमूर्त है, ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्यादिक अनन्त धर्मात्मक है इसीलिये यह नाश-रहित द्रव्य है ।
यह जीव साधारण गुण सहित है और असाधारण गुण सहित भी है । विश्व (जगत्‌) रूप है परन्तु विश्व में ठहरा नहीं है । सबसे उपेक्षा रखनेवाला है, तो भी सबका जाननेवाला है ।
यह जीव असंख्यात प्रदेशवाला है । तथापि अखण्ड द्रव्य है अर्थात्‌ इसके प्रदेश सब अभिन्न हैं तथा सम्पूर्ण दव्यों से यह भिन्न है तथापि उनके बीच में स्थित है ।
शुद्ध नय की अपेक्षा से यह जीव द्रव्य शुद्ध स्वरूप है, एक रूप है, उसमें भेद कल्पना नहीं है, तथापि पर्याय दृष्टि से यह जीव दो प्रकार है एक मुक्त जीव दूसरा अमुक्त जीव ।