
बद्धो यथा स संसारी स्यादलब्धस्वरूपवान् ।
मूर्छितोनादितोष्टाभिर्ज्ञानाद्यावृतिकर्मभि: ॥34॥
अन्वयार्थ : जो आत्मा कर्मों से बंधा हुआ है, वही संसारी है। संसारी आत्मा अपने यथार्थ स्वरूप से रहित है और अनादिकाल से ज्ञानावरणीय आदिक आठ कर्मों से मूर्छित हो रहा है ।