
द्वयोरनादिसम्बन्ध: कनकोपलसन्निभ: ।
अन्यथा दोषएव स्यादितरेतरसंश्रयः ॥36॥
अन्वयार्थ : जीव और कर्म दोनों का सम्बन्ध अनादि-काल से चला आ रहा है । यह सम्बन्ध उसीप्रकार है जिसप्रकार कि कनकपाषाण का सम्बन्ध अनादि-कालीन होता है । यदि जीव पुद्गल का सम्बन्ध अनादि से न माना जाय तो अन्योन्याश्रय दोष आता है ।