+ अन्योनयाश्रय दोष -
तद्यथा यदि निष्कर्मा जीवः प्रागेव तादृशः ।
बन्धाभावेथ शुद्धेपि बन्धश्चेन्निर्वृत्ति: कथम्‌ ॥37॥
अन्वयार्थ : यदि जीव पहले कर्म-रहित अर्थात्‌ शुद्ध माना जाय तो बन्ध नहीं हो सकता, और यदि शुद्ध होने पर भी उसके बन्ध मान लिया जाय तो फिर मोक्ष किसप्रकार हो सकता हैं ?