
अथ चेत्पुद्गल: शुद्ध: सर्वत: प्रागनादितः ।
हेतोर्विना यथा ज्ञानं तथा क्रोधादिरात्मनः ॥38॥
अन्वयार्थ : यदि कोई यह कहे कि पुद्गल अनादि से सदा शुद्ध ही रहता है, ऐसा कहनेवाले के मत में आत्मा के साथ कर्मों का सम्बन्ध भी नहीं बनेगा । फिर तो बिना कारण जिसप्रकार आत्मा का ज्ञान स्वाभाविक गुण है उसीप्रकार क्रोधादिक भी आत्मा के स्वाभाविक गुण ही ठहरेंगे ।