एवं बन्धस्य नित्यत्वं हेतो: सद्भावतोऽथवा ।
द्रव्याभावो गुणाभावे क्रोधादीनामदर्शनात्‌ ॥39॥
अन्वयार्थ : यदि पुद्गल को अनादि से शुद्ध माना जाय और शुद्ध अवस्था में भी उसका आत्मा से बन्ध माना जाय तो वह बन्ध सदा रहेगा, क्योंकि शुद्ध पुद्गल रूप हेतु के सद्भाव को कौन हटानेवाला है ? पुद्गल की शुद्धता स्वाभाविक है वह सदा भी रह सकती है, और हेतु की सत्ता में कार्य भी रहेगा ही ।