
जीवस्याशुद्धरागादिभावानां कर्म कारणम् ।
कर्मणस्तस्य रागादिभावाः प्रत्युपकारिवत् ॥41॥
अन्वयार्थ : [प्रत्युपकारिवत्] परस्पर उपकारक की तरह [जीवस्य] जीव के [अशुद्धरागादिभावानां] अशुद्ध रागादिक भावों का कारण कर्म है और [तस्य कर्म] उस द्रव्य-कर्म का कारण [रागादिभावाः] रागादिक भाव है ।