पूर्वकर्मोदयाद्भावो भावात्प्रत्यग्रसंचय: ।
तस्य पाकात्पुनर्भावो भावाद्बन्ध:पुनस्ततः ॥42॥
एवं सन्तानतोऽनादिः सम्बन्धी जीवकर्मणो: ।
संसारः स च दुर्मोच्यो विना सम्यग्दृगादिना ॥43॥
अन्वयार्थ : [पूर्वकर्मोदयाद्भावो] पूर्वबद्ध कर्मों के उदय से रागादिक भाव होते है और [भावात्प्रत्यग्रसंचय:] उन रागादिक भावों से नवीन कर्मों का संचय होता है तथा [तस्य पाकात्‌] उन नवीन कर्मों के उदय से [पुन: भाव:] फिर रागादिक भाव होते है और [तत: भावात्‌] उन रागादिक भावों से [पुनः बन्धः] फिर नवीन कर्मों का बन्ध होता है [एव] इसप्रकार [संतानत] सन्तान परम्परा से जो [जीवकर्मणो: अनादिसम्बन्धः] जीव और कर्मों का अनादि सम्बन्ध है वही [ससारः] संसार है (व) तथा [स:] वह संसार [सम्यग्दृगादिना विना] सम्यग्दर्शनादिक के बिना [दुर्मोच्च:] छूट नहीं सकता है ।