अयस्कान्तोपलाकृष्ट सूचीवत्तद्-द्वयोः प्रथक्‌ ।
अस्ति शक्तिर्विभावाख्या मिथो बन्धाधिकारिणी ॥45॥
अन्वयार्थ : [तद्-द्वयोः] उन दोनों जीव और कर्मों में [पृथक] भिन्न-भिन्न [मिथः] परस्पर में [बन्‍धाधिकारिणी] बन्ध को कराने वाली [अयस्कान्तोपलाकृष्ट सूचीवत्त] चुम्बक-पत्थर के द्वारा खिंचनेवाली लोहे की सूई के समान (आकर्षक तथा आकृष्यरूप) [विभवाख्या शक्ति: अस्ति] विभाव नाम की शाक्ति है ।