इतरेतरबन्धश्च देशानां तद्-द्वयोर्मिथ: ।
बन्ध्य बन्धकभावः स्याद्भावबन्धनिमित्तत ॥48॥
अन्वयार्थ : [च] तथा [तद्-द्वयो:] उन जीव और कर्मों के [देशानां] प्रदेशों का [मिथः] परस्पर में [भावबन्धनिमित्ततः] भाव-बन्ध के निमित्त से जो [बन्ध्य बन्धकभावः] बन्ध्यबन्धक भाव है वह [इतरेतरबन्ध: स्यात्‌] इतरेतर बन्ध (उभयबन्ध) कहलाता है ।