नाप्यसिद्धं स्वतस्सिद्धेरस्तित्वं जीवकर्मणो: ।
स्वानुभवगर्भेयुक्तेर्वा चित्समक्षोपलब्धितः ॥49॥
अन्वयार्थ : [स्वतस्सिद्धे] स्वतः सिद्धि से तथा [स्वानुभवगर्भेयुक्ते:] स्वानुभव सहित युक्तियों से [वा] और [चित्समक्षोपलब्धितः] स्वसंवेदन प्रत्यक्ष से [जीवकर्मणो: अपि] जीव और कर्म का [अस्तित्वं] अस्तित्व [असिद्धं न] असिद्ध नहीं है ।