अहम्प्रत्ययवेद्यत्त्वाज्जीवस्यास्तित्वमन्वयात् ।
एको दरिद्र एको हि श्रीमानिति च कर्मण: ॥50॥
अन्वयार्थ : [अहम्प्रत्ययवेद्यत्त्वात्] अहं प्रत्यय वेद्यरूप (स्व-संवेदन) [अन्वयात्‌] अन्वय से [जीवस्य] जीव का [अस्तित्व] अस्तित्व सिद्ध होता है और [हि] निश्चय से [एकः दरिद्रः] कोई दरिद्री [च] तथा [एकः श्रीमान्] कोई धनवान होता है [इति] इसलिए (इस दशा की विचित्रता से) [कर्मण] कर्म का [अस्तित्व] अस्तित्व सिद्ध होता है ।