यथास्तित्वं स्वत: सिद्धं संयोगोपि तथानयो: ।
कर्तृभोक्त्रादिभावानामन्यथानुपपत्तित: ॥51॥
अन्वयार्थ : [यथा] जैसे [अनयोः] जीव और कर्म का [अस्तित्वं] अस्तित्व [स्वतः सिद्धं] स्वतः सिद्ध है [तथा] वैसे ही [सयोग: आपि] उन दोनों का संयोग भी स्वतः सिद्ध है [अन्यथा] नहीं तो (यदि उनका संयोग स्वत: सिद्ध नहीं माना जाय तो) [कर्तृभोक्त्रादिभावानाम्] उनमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व आदि भावों की [अनुपपत्तितः] उपपत्ती नहीं बन सकेगी ।