
ननु मूर्तिमता मूर्तो बध्यते द्वयणुकादिवत् ।
मूर्तिमत्कर्मणा बन्धो नामूर्तस्य स्फुटं चितः ॥52॥
अन्वयार्थ : [ननु] शंकाकार का कहना है कि [द्वयणुकादिवत्] जैस द्वयणुक आदि स्कंधों में मूर्तिमान् परमाणुओं का मूर्त परमाणुओं से ही बन्ध होता है वैसे ही [मूर्त्तिमता मूर्त: बध्यते] मूर्तिमान के साथ मूर्त का बन्ध होता है अत: [स्फुटं] यह स्पष्ट है कि [मूर्तिमत् कमणा] मूर्तिमान कर्म के साथ [अमूर्तस्य चित बन्ध: न] अमूर्त का बन्ध नहीं हो सकता है ।