
अग्नेरौष्ण्यं यथा लक्ष्म न केनाप्यर्जितं हि तत् ।
एवं विधः स्वभावाद्वा न चेत्स्पर्शेन स्पृश्ताम् ॥54॥
तथानादिः स्वतो बन्धो जीवपुद्गलकर्मणो: ।
कुतः केन कृत: कुत्र प्रश्नोऽयं व्योमपुष्पवत् ॥55॥
चेद् बुभुत्सास्तिचित्ते ते स्यात्तथा वान्यथेति वा ।
स्वानुभूतिसनाथेन प्रत्यक्षेण विमृश्यताम् ॥56॥
अन्वयार्थ : [यथा] जैसे ['यत्'] जो [अग्नेरौष्ण् लक्ष्म] अग्नि का उष्णतारूप लक्षण है [तत्] वह [हि] निश्चय से [केन अपि अर्ञितं न] किसी ने भी बनाया नही हैं किंतु [स्वभावात् वा एवं विधः] स्वभाव से ही वह ऐसा है [न चेत्] यदि ऐसा नहीं मानते हो तो [स्पर्शेन स्पृश्ताम्] छूकर देख लो [तथा] वैसे ही [जीवपुद्नलकर्मणो:] जीव और पुद्गलस्वरूप कर्मों का [बन्धः] बन्ध [स्वत: अनादिः] स्वयं अनादि है इसलिय [कुतः] क्यों हुआ, [केन कृत:] किसने किया, [कुत्र] कहाँ हुआ [अयं प्रश्न:] यह प्रश्न [व्योमपुष्पवत्] आकाश के फूल की तरह व्यर्थ है ।
[चेत्] यदि [तथा वा स्यात् अन्यथा वा] जीव कर्मों का सम्बन्ध अनादि है [वा] सादि है [इति] यह [वुभुत्सा] जानने की इच्छा [ते चित्ते अस्ति] तेरे हृदय में हो तो [स्वानुभूति सनाथेन प्रत्यक्षेण] स्वानुभव प्रत्यक्ष से [विमृश्यतां] परीक्षा कर ली जावे ।