
अस्त्यमूर्तं मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं च वस्तुतः ।
मद्यादिना समू्र्त्तेन स्यात्तत्पाकानुसारि तत् ॥57॥
अन्वयार्थ : [वस्तुतः] वास्तव में [मतिज्ञानं] मातिज्ञान और [श्रुतज्ञानं] श्रुतज्ञान [अमूर्तं अस्ति] अमूर्त हैं किंतु [तत्] वह दोनों प्रकार का ज्ञान [समुर्तेन मद्यादिना] मूर्तिक मद्य आदि के सम्बन्ध से [तत्पाकानुसारि स्यात्] मद्यादिक के परिपाक के अनुसार मूर्च्छित हो जाता है ।