नासिद्धं तद्यथायोगात्‌ यथा दृष्टोपलब्धितः ।
विना मद्यादिना यस्मात् तद्विशिष्टं न तद्-द्वयम् ॥58॥
अन्वयार्थ : [यथा दृष्टोपलब्धितः] जैसे कि लोक में देखा जाता है यदि उसके अनुसार वास्तव में देखा जावे तो [तथायोगात्‌] मद्यादिक के सम्बन्ध से [तत्‌] वे दोनों (मति और श्रुतज्ञान) मूर्च्छित हो जाते हैं यह कथन [असिद्ध न] असिद्ध नहीं है [यस्मात्] क्योंकि [तद्-द्वय] वे दोनों (माति और श्रुतज्ञान) [मद्यादिनाविना] मद्यादिक के बिना [तद्विशिष्टं न] मद्य पीने वाले के समान मलिन (विकारयुक्त) नहीं होते हैं ।