
ननु वैभाविकभावाख्या क्रिया चेत्पारिणामिकी ।
स्वाभाविक्याः क्रियायाश्च कः शेषो हि विशेषभाक् ॥63॥
अपि चार्थपरिच्छेदि ज्ञानं स्वं लक्षणं चितः ।
ज्ञेयाकाराक्रिया चास्य कुतो वैभाविकी क्रिया ॥64॥
तस्माद्यथा घटाकृत्या घटज्ञानं न तद्घटः ।
मद्याकृत्या तथाज्ञानं ज्ञानं ज्ञानं न तन्मयम् ॥65॥
अन्वयार्थ : [ननु] शंकाकार का कहना है कि [चेत] यदि [वैभाविकभावाख्या क्रिया पारिणामिकी] वैभाविकी क्रिया भी अनादि सत् में परिणमनशीलता से होती है तो [हि] निश्चय से [स्वाभाविक्याः क्रियाया:] उसमें, स्वभाविकी क्रिया से [विशेषभाक्] विशेषता को रखनेवाला [कश्च शेषः] कौनसा विशेष भेद रहेगा ?
[अपि च] तथा [अर्थपरिच्छेदि ज्ञानं] पदार्थों का जाननेवाला ज्ञान [चितः] आत्मा का [स्वं लक्षणं] स्व-लक्षण है इसीलये [अस्य च] इस ज्ञान की यह [ज्ञेयाकाराक्रिया] ज्ञेय के आकार होनेरूप क्रिया [कुतो वैभाविकी क्रिया] किस तरह से वैभाविकी क्रिया हो सकती है ।
[तस्मात्] इसलिए [यथा] जैसे [घटाकृत्या] घटरूप ज्ञेयाकार होने से [तत् घटज्ञानं ] वह घट का ज्ञान [घट: न] घट नहीं हो जाता है वैसे ही [मद्याकृत्या] मद्य के अनुभव से [ज्ञानं] ज्ञान [न तन्मयम्] मद्यमय नहीं हो जाता है किंतु [ज्ञान] ज्ञान [ज्ञान] ज्ञान ही रहता है ।