मोहकर्मावृतं ज्ञानं प्रत्यर्थं परिणामि यत्‌ ।
इष्टानिष्टार्थसंयोगात्‌ स्वयं रज्यद्-द्विषद्यथा ॥67॥
अन्वयार्थ : [यत्‌ ज्ञानं] जो ज्ञान [मोहकर्मावृतं] मोह-कर्म से युक्त है वह [यथा] जैसे [इष्टानिष्टार्थसंयोगात्‌ स्वयं] इष्ट और अनिष्ट अर्थ के संयोग से स्वयं [रज्यद्-द्विषद्यथा] राग-द्वेषमय होता है वैसे ही [प्रत्यर्थं परिणामि] प्रत्येक पदार्थ का विषय करनेवाला होता है (युगपत्‌ सब पदार्थों को विषय करनेवाला नहीं होता है ।