तत्र ज्ञानमबद्धं स्यान्मोहकर्मातिगं यथा ।
क्षायिकं शुद्धमेवैतल्लोकालोकावभासकम् ॥68॥
अन्वयार्थ : [यथा तत्र] जैसे उन (बद्ध और अबद्ध) ज्ञानों में [मोहकर्मातिगं ज्ञानं] मोह-कर्म के नाश से व्यक्त होनेवाला ज्ञान [अबद्ध स्यात्‌] अबद्ध हो जाता है तथा [एतत् एव] यही ज्ञान [क्षायिकं शुद्धं] क्षायिक, शुद्ध और [लोकालोकावभासकम्] लोक व अलोक का प्रकाशक है ।