
ततः सिद्धः सुदृष्टान्तो मूर्तंज्ञानद्वयं यथा ।
अस्त्यमूर्तोपी जीवात्मा बद्ध: स्यान्मूर्तकर्मभि: ॥70॥
अन्वयार्थ : [तत: सिद्धः सुदृष्टान्तो] इसालिये यह सम्यग्दृष्टान्त सिद्ध हुआ कि [यथा] जैसे [ज्ञानद्वय अमूर्तं सत्] मतिज्ञान और श्रुतज्ञान अमूर्त होते हुए भी [मूर्तं अस्ति] मूर्त कहलाते हैं वैसे ही [अमूर्त: जीव: अपि] अमूर्त जीव भी [बद्ध: स्यान्मूर्तकर्मभि:] मूर्त कर्म से बद्ध होता है ।