
किन्तु तस्यास्तथाभाव: शुद्धादन्योन्यहेतुकः ।
तन्निमित्ताद्विना शुद्धो भावः स्यात्केवलं स्वतः ॥81॥
नासिद्धोसौ हि सिद्धान्त: सिद्धः संदृष्टितो यथा ।
वह्नियोगाज्जलंचोष्णं शीतं तत्तदयोगत: ॥82॥
अन्वयार्थ : [किन्तु] किन्तु [तस्या:] उस का [शुद्धात् अन्य तथाभावः] वह अशुद्ध परिणमनरूप विभावभाव [अन्यहेतुकः] पर-निमित्त से होता है और शुद्ध अवस्था में [तन्निमित्ताद्विना] उस निमित्त के अभाव में उसका [स्वतः केवलं] स्वयं केवल [शुद्ध: भावः स्यात्] शुद्ध ही परिणमन होता है ।
[असौ सिद्धांत:] यह उक्त सिद्धांत [असिद्ध न] असिद्ध नहीं है [हि] क्योंकि [सिद्धः संदृष्टित] इस दृष्टांत से सिद्ध होता है [यथा] जैसे कि [वह्नियोगाज्जलंचोष्णं] अग्नि के सम्बन्ध से जल उष्ण हो जाता है [च] और [तदयोगतः] उस अग्नि का सम्बन्ध न रहने से वह जल स्वभाव से शीत रहता है ।