+ वैभाविक और स्वाभाविक को युगपत्‌ मानने में दोष -
यौगपद्ये महान्‌ दोष:स्तद्-द्वयस्य नयादापि ।
कार्यकारणयोर्नाशो नाश: स्याद्बन्धमोक्षयो:॥92॥
अन्वयार्थ : [तद्-द्वयस्य] उन दोनों (श्वाभाविकी और वैभाविकी शाक्ति) का [यौगपद्ये] एक काल में सद्भाव मानने पर [नयात्‌ अपि] न्याय से भी [महान्‌ दोपः स्यात्] बडा भारी दोष आएगा क्योंकि युगपत स्वाभाविक और वैभाविक भाव के मानने से [कार्यकारणयोर्नाशो] कार्य-कारण भाव के नाश का तथा [स्याद्बन्धमोक्षयो: नाश:] बन्ध व मोक्ष के नाश होने का प्रसंग आता है ।