
नैकशक्तेर्द्विधाभावो यौगपद्यानुषङ्गत: ।
सति तत्र विभावस्य नित्यत्वं स्यादवाधितम् ॥93॥
अन्वयार्थ : [एकशक्ते द्विधाभावो न] तथा एक काल में एक शक्ति के दो तरह के परिणमन नहीं हो सकते हैं क्योंकि एक शक्ति के युगपत् दो परिणमन मानने से [यौगपद्यानुषङ्गत:] युगपत् दोनों प्रकार के परिणमन के सद्भाव का प्रसंग आता है तथा [तत्र सति] ऐसा होने पर [विभावस्य] विभाव परिणमन में भी [अवाधित नित्यत्वं स्यात्] अबाधित नित्यत्व का प्रसंग आता है ।