ननु चानादितः सिद्धं वस्तुजातमहेतुकम् ।
तथाजातं परं नाम स्वतः सिद्धमहेतुकम् ॥94॥
तदवश्यमवश्यं स्यादन्यथा सर्वसंकर: ।
सर्वशून्यादिदोषश्च दुर्वारो निग्रहास्पदम् ॥95॥
ततः सिद्धं यथा वस्तु यत्किंच्चिज्जडात्मकम् ‌।
तत्सर्वं स्वस्वरूपाद्यै: स्यादनन्यगतिः स्वतः ॥96॥
अयमर्थ: कोपि कस्यापि देशमात्रं हि नाश्नुते ।
द्रव्यतः क्षेत्रतः कालाद्भावात् सीम्नोनतिक्रमात् ॥97॥
व्याप्यव्यापकभावस्य स्यादभावेपि मूर्तिमत् ।
द्रव्यं हेतुर्विभावस्य तत्किं तत्रापि नापरम् ॥98॥
वैभाविकस्य भावस्य हेतुः स्यात्सन्रिकर्षतः ।
तत्रस्थोप्यपरो हेतुर्न स्यात्किंवा वतेति चेत् ॥99॥
अन्वयार्थ : [ननु च] शंकाकार का कहना है कि [यथा अनादितः] जैसे अनादि से [वस्तुजातं अहेतुकं सिद्दं] सम्पूर्ण पदार्थ किसी अन्य कारण से उत्पन्न न होने के कारण स्वत:सीद्ध है [तथा] वैसे ही उनका [परं जातं नाम] प्रतिसमय परिणमनशील होना भी [अहेतुक स्वत:सिद्धं] किसी अन्य कारण से उत्पन्न न होने के कारण स्वतःसिद्ध है (जैसे द्रव्य स्वत:सिद्ध है वैसे ही उनका परिणाम भी स्वतःसिद्ध है)
इसलिए [तत्‌] वह परिणमनशील वस्तुसमूह [अवश्यं अवश्य स्यात्] अवश्य स्वतंत्र है (अपने अपने परिणमन में कोई किसी की आवश्यकता नहीं रखता है क्योंकि [अन्यथा] यदि ऐसा नहीं माना जायगा तो [दुर्वार] अनिवार्य तथा [निग्रहास्पदं] हेय [सर्वसंकरः] सर्वसंकर दोष [च] और [सर्वशून्यदिदोष] सर्व शून्यता आदि दाषों का प्रसंग आवेगा ।
[ततःसिद्धं] इसलिये सिद्ध होता है कि [यथावस्तु] अपने अपने वस्तु उल्लंघन नहीं करनेवाला [चिज्जडात्मक] चेतनात्मक तथा अचेतनात्मक [यत्किंचित्‌] जो कुछ भी है [तत्सर्वै] वह सब (सम्पूर्ण पदार्थ) [स्वस्वरूपाद्यै:] अपने स्वरूप आदि से [स्वत:] स्वयं [अनन्यगतिः स्यात्] एक दूसरेरूप नहीं हो जाते है (कोई भी पदार्थ अपने स्वभाव का परित्याग नहीं करता है ।
[अयं अर्थ:] पूर्वोक्त कथन का सारांश यह है कि [कः अपि] कोई भी पदार्थ [कस्य अपि] किसी पदार्थ को [हि] वास्तव में [द्रव्यत:] द्रव्य से [क्षेत्रत] क्षेत्र से [कालात्‌] काल से और [भावात्‌] भाव से [देशमात्र] अंशमात्र भी [न अश्नुते] अपने में नहीं मिला सकता है क्योंकि [सीम्न: अनतिक्रमात्‌] पदार्थ अपने स्वभाव की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता है । तथा
[व्याप्यव्यापक भावस्य अभावे अपि] जीव और पुद्गल में व्याप्य-व्यापक भाव के अभाव होने पर भी [तत्र] आत्मा के [विभावस्य हेतु] विभाव परिणमन में कारण [तत्‌ मूर्तिमत्‌ द्रव्यं अपि] वह मूर्तिक द्रव्य ही क्यों होता है [अपरं कि न] अन्य द्रव्य क्यों नहीं है ?
यदि कदाचित् कहा जाय कि आत्मा में [सन्निकर्षतः] मूर्तिक द्रव्य का सन्निकर्ष होने से (आत्मा के साथ मूर्त-द्रव्य का एकक्षेत्रावगाहरूप होने से वह मूर्त-द्रव्य जीव के [वैभाविकस्य भावस्य हेतु: स्यात्‌] वैभाविक भाव में कारण हो जाता है तो [वत] खेद है कि [तत्रस्थ अपर अपि] वहीं पर रहनेवाला विस्रसोपचयरूप अन्य मूर्तद्रव्य समुदाय भी [हेतु: किं वा न स्यात्] विभाव परिणमन का कारण क्यों नही होता है [इति चेत] यदि ऐसा कहा तो ?