
सत्यं बद्धमबद्धं स्याच्चिद्द्रव्यं चाथ मूर्तिमत् ।
स्वीयसम्बन्धिभिर्बद्धमबद्धं परबन्धिभि: ॥100॥
बद्धाबद्धत्वयोरस्ति विशेष: पारमार्थिक: ।
तयोर्जात्यन्तरत्वेपि हेतुमद्धेतुशक्तित: ॥101॥
अन्वयार्थ : [सत्यं] सत्य है कि [चिद्द्रव्य] जीव द्रव्य [अथ] ओर [मूर्तिमत्] पुद्गल-द्रव्य [बद्धं च अबद्धं स्यात्] बद्ध तथा अबद्ध दोनों प्रकार के होते हैं क्योंकि [स्वीयसम्बन्धिभिः बद्ध] जिनसे जिनका परस्पर में बन्ध्य-बन्धक भाव है उनसे वे बद्ध हैं और [परबन्धिभि; अबद्धं] जिनसे जिनका बन्ध्य-बन्धक भाव नहीं उनसे वे अबद्ध हैं ।
[तयो:] उन में [जात्यन्तरत्वे अपि] जाति की अपेक्षा अन्तर रहने पर भी [हेतुमद्वेतुशक्तितः] कार्य-कारण शक्ति से होने वाली [बद्धाबद्धत्वयो] बद्धता तथा अबद्धता में [पारमार्थिकः विशेषः अस्ति] वास्तविक भेद है ।