
बद्ध:स्याद्बद्धयोर्भावः स्यादबद्धोप्यबद्धयो: ।
सानुकूलतया बन्धो न बन्धः प्रतिकूलयोः ॥102॥
अन्वयार्थ : [बद्धयो: भाव बद्ध स्यात्] एक दूसरे से बंधे हुए दोनों के भाव को बद्ध कहते हैं । [अपि] और [अबद्धयोः अबद्ध स्यात्] एक-दूसरे से नहीं बंधे हुए दोनों के भाव को अबद्ध कहते हैं क्योंकि [सानुकूलतया बन्धः] जीव में बन्धक शक्ति तथा कर्म बंधने की शक्ति की परस्पर अनुकूलता में ही बन्ध होता है और [प्रतिकूलयो: बन्धः न] उन दोनों के परस्पर प्रतिकूल होने पर बन्ध नहीं होता है ।