+ बन्ध-भेद -
अर्थतस्त्रिविधो बन्धो वाच्यं तल्लक्षणं त्रयम्‌ ।
प्रत्येकं तद्-द्वयं यावत्-तृतीयस्तूच्यतेऽधुना ॥103॥
अन्वयार्थ : [अर्थतः] अर्थ की अपेक्षा से [बन्ध त्रिविधः] बन्ध तीन प्रकार का होता है इसलिये [तत्‌ लक्षणत्रयं] तीनों के लक्षण [वाच्यं] कहना चाहिये; उनमे से [तत्‌ द्वय तु यावत्‌ प्रत्येकं] आदि के दो-दो बन्‍ध तो जीव-बन्ध और कर्म-बन्ध इसतरह प्रत्येक भंग की अपेक्षा से है किन्तु उभय-बन्ध दोनों के संयोग से होता है अतः [अधुना तृतीय उच्यते] अब तीसरे उभय-बन्ध का स्वरूप कहा जाता है ।