+ उभय-बन्‍ध -
जीवकर्मोभयोर्बन्धः स्यान्मिथः साभिलाषुकः ।
जीवः कर्मनिबद्धो हि जीवबद्धं हि कर्म तत्‌ ॥104॥
तद्गुणाकारसंक्रान्ति र्भावो वैभाविकश्चितः ।
तन्निमितं च तत्कर्म तथा सामर्थ्यकारणम्‌ ॥105॥
अन्वयार्थ : [य] जो [जीवकर्मोभयो:] जीव और कर्म का [मिथः] परस्पर [साभिलाषुकः] एक-दूसरे की अपेक्षा से बन्‍ध होता है [सः बन्धः स्यात्‌] वह उभय-बन्‍ध कहलाता है [हि] क्योंकि [जीवः कर्म निबद्ध:] जीव कर्म से बन्धा हुआ है तथा [तत्‌ कर्म हि जीवबद्धं] वह कर्म जीव से बंधा हुआ है ।
[चितः] आत्मा के गुणों का [तद्गुणाकारसंक्रान्तिः] उस (कर्मरूप पुद्गल) के गुणाकाररूप कथंचित संक्रमण होना [वैभाविकः भाव:] वैभाविक भाव कहलाता है [च] और [तन्निमित्तं] उसका निमित्त [तथा सामर्थ्यकारणम्‌] तथा समर्थ कारण (प्रेरक) [तत्कर्म] वह द्रव्यकर्म होता है ।