
अर्थोयं यस्य कार्यं तत् कर्मणस्तस्य कारणम् ।
एको भावश्च कर्मैकं बन्धोयं द्वन्द्वजः स्मृत: ॥106॥
तथाऽऽदर्शे यथा चक्षु: स्वरूपं संदधत्पुनः ।
स्वाकाराकारसंक्रान्तं कार्यं हेतुः स्वयं च तत् ॥107॥
अन्वयार्थ : [अय॑ अर्थ:] सारांश यह है कि [भावः एक:] भाव एक है [च] और [कर्म एकं] कर्म एक है तथा [अयं बन्ध द्वन्दजः स्मृत:] यह बन्ध उन दोनों से उत्पन्न तृतीय दशारूप कहा गया है इसलिए [यस्य कर्मण:] जिस द्रव्य-कर्मरूप क्रोधादिक का [तत्कार्यं] वह कार्य है [तस्व कर्मण कारणम्] उस कर्म के आस्रव के लिय वह कारण होता है ।
[यथा] जैसे कि [आदर्शे] दर्पण में [स्वाकाराकारसंक्रान्तं] अपने आकार से प्रतिबिम्बित [स्वरूपं संदधत्पुनः चक्षु:] अपने स्परूप का प्रतिबिम्ब स्थापित करनेवाला वह चक्षु [स्वयं कार्यं] स्वयं कार्य है [पुनः] और [हेतु] स्वयं कारण भी है ।