जीवभावविकारस्य हेतु: स्याद्-द्रव्य कर्म तत्‌ ।
तद्धेतुस्तद्विकारश्च यथा प्रत्युपकारकः ॥109॥
चिद्विकाराकृतिस्तस्य भावो वैभाविकः स्मृतः ।
तन्निमित्तात्पृथग्भूतोप्यर्थ: स्यात्तन्निमित्तकः ॥110॥
अन्वयार्थ : [तत्‌ द्रव्यकर्म] वह द्रव्यकर्म [जीवभावविकारस्य हेतुः स्यात्] जीव के ज्ञानादिक भावों के विकार का कारण होता है [च] और [तद्विकार:] उस (जीव) के भावों का विकार [तद्धेतु:] द्रव्य-कर्म के आस्रव का कारण होता है [यथा] जैसे कि [प्रत्युपकारक] परस्पर उपकार करनेवाले एकदूसरे को कार्य-कारणरूप होते हैं ।
[तस्य चिद्विकाराकृति:] उस जीव के विकारी भाव (क्रोधादिकरूप-रागद्वेषरूप परिणति) [वैभाविकः भाव: स्मृतः] उसका वैभाविक भाव माना गया है और [तन्निमित्तकः स्यात्] उस जीव के वैभाविक भाव के निमित्त से [पृथक्भूत अपि अर्थ] पृथक् रहनेवाला कार्मण वर्गणारूप पुद्गल [तन्निमित्तक: स्यात्‌] उस (जीव) के वैभाविक भाव के निमित्त (ज्ञानावरणादि कर्मरूप) में परिणत हो जाता है ।