
तद्धि नोभयबन्धाद्वै वहिर्बद्धाश्चिरादपि ।
न हेतवो भवन्त्येकक्षेत्रस्याप्यबद्धवत् ॥111॥
अन्वयार्थ : [हि] निश्चय से [तत्] यह [उभयबन्धात् बहि: न] उभय-बन्ध के बिना जीव के विकार भी कारण नहीं हाता है क्योंकि [वै] निश्चय से [चिरात् अपि बद्धाः] चिरकाल से ही कर्म-परमाणुओं के साथ सम्बन्ध को प्राप्त तथा [एकक्षेत्रस्था: अपि] एक-क्षेत्रावगाही होकर रहनेवाली भी विस्रसोपचयरूप कार्माण वर्गणायें [अबद्धवत्] अबद्ध कार्माण वर्गणाओं की तरह [हेतव: न भवन्ति] जीव के विकार में कारण नहीं होती है ।