+ बन्‍ध की अविनाभाविनी अशुद्धता का लक्षण -
तद्भद्धत्त्वाविनाभूतं स्यादशुद्धत्त्वमक्रमात्‌ ।
तल्लक्षणं यथा द्वैतं स्यादद्वैतात्स्वतोन्यतः ॥112॥
अन्वयार्थ : [अक्रमात्‌] जिस समय बन्ध होता है उस समय [तद्भद्धत्त्वाविनाभूतं] बद्धता से अविनाभाव रखनेवाली [अशुद्धत्वं स्यात्‌] अशुद्धता उत्पन्न होती है [यथा] जैसे [स्वतः अद्वैतात्] स्वयं अद्वैत अवस्था से [अन्यतः] पर-निमित्त के कारण [द्वैतं] द्वैतरूप हो जाना ही [तल्लक्षणं स्यात्‌] उस अशुद्धता का स्वरूप है ।