
तत्राऽद्वैतेपि यद्-द्वैतं तद्-द्विधाप्यौपचारिकम् ।
तत्राद्यं स्वांशसंकल्पश्चेत्सोपाधि द्वितीयकम् ॥113॥
अन्वयार्थ : [तत्र अद्वैते अपि] उस अद्वैत में भी [यत्] जो [द्विधा अ्पि द्वैतं] दोषकारक भी द्वैत कहा जाता है [तत् औपचारिकं] वह औपचारिक है अर्थात् व्यवहारनय से है उनमें से [आद्यं स्वांशसंकल्प: चेत्] यदि अपने-अपने अंश की कल्पना करना प्रथम द्वैत है तो [सोपाधि द्वितीयकं] उपाधि-सहित होना द्वितीय द्वैत है ।