
ननु चैकं सत्सामान्यात् द्वैतं स्यात्सद्विशेषतः ।
तद्विशेषेपि सोपाधि निरुपाधि कुतोर्थतः ॥114॥
अपिचाभिज्ञानमत्रास्ति ज्ञानं यद्रसरूपयो: ।
न रूपं न रसो ज्ञानं ज्ञानमात्रमथार्थतः ॥115॥
अन्वयार्थ : [ननु] शंककार का कहना है कि [सामान्यात्] सामान्य की अपेक्षा से [सत् एकं] सत् एक है [च] और [विशेषत] विशेष की अपेक्षा से [सत् द्वैतं स्यात्] सत् द्वैतरूप है इसलिए [सद्विशेषेऽपि] सत् विशेष में भी [सोपाधि] सोपाधि और [निरुपाधि] निरुपाधि कल्पना [कुत: अर्थतः] किस प्रयोजन से की जाती है ?
[अत्र च] इस विषय में [अभिज्ञान अपि अस्ति] दृष्टांत भी है [यथा] जैसे कि [यत् रसरूपयो:] जो रस और रूप का [ज्ञानं] ज्ञान होता है [तत् ज्ञानं] वह ज्ञान [न रूपं अय न रसो] न रूप-स्वरूप ही हो जाता है और न रस-स्वरूप भी हो जाता है क्योंकि वह [अर्थतः] वास्तव में [ज्ञानमात्रं] ज्ञान स्वरूप ही होता है ।