
नैवं यतो विशेषोस्ति सद्विशेषेपि वस्तुतः ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां द्वाभ्यां वे सिद्धसाधनात् ॥116॥
तत्रान्वयो यथा ज्ञानमज्ञानं परहेतुतः ।
अर्थाच्छीतमशीतं स्याद्वह्नियोगाद्धि वारिवत् ॥117॥
नासिद्धोसौ हि दृष्टान्तो ज्ञानस्याज्ञानतः सतः ।
अस्त्यवस्थान्तरं तस्य यथाज्ञातप्रमात्त्वत: ॥918॥
अन्वयार्थ : [एवं न] ऐसा नहीं है [यत: वस्तुत:] क्योंकि वास्तव में [सद्विशेषेपि] सत् के विशेष रहने पर भी [वै] निश्चय से [अन्वयव्यतिरेकाभ्यां द्वाभ्यां] दोनों प्रकार के अन्वय और व्यतिरेक दृष्टांत से [सिद्धसाधनात्] साधन के सिद्ध होने के कारण [विशेष: अस्ति] विशेषता पाई जाती है ।
[तत्र] उनमें [अन्वयः] अन्वय दृष्टांत इसप्रकार है [यथा] जैसे कि [अथोत्] अर्थ-दृष्टि से [ज्ञानं] ज्ञान [परहेतुत] पर के निमित्त से [अज्ञानं] अज्ञान हो जाता है [हि] क्योंकि [शीतं] शीत-पदार्थ [वन्हियोगात्] अग्नि के संयोग से [वारिवत्] जल के समान [अशीत स्यात्] उष्ण हो जाता है ।
[नासिद्धोसौ हि दृष्टान्तो] यह दृष्टांत असिद्व नहीं है क्योंकि [सत: ज्ञानस्य] सम्यग्ज्ञान को [अज्ञानत:] अज्ञानरूप हो जाने से [तस्य] उसकी [यथाजातप्रमात्त्वत:] वास्तविक ज्ञानत्व से [अवस्थांतर अस्ति] भिन्न अवस्था हो जाती है ।