
व्यतिरेकोस्त्यात्मविज्ञानं यथास्वं परहेतुतः ।
मिथ्यावस्थाविशिष्टं स्याद्यनैवं शुद्धमेव तत् ॥119॥
तद्यथा क्षायिकं ज्ञानं सार्थं सर्वार्थगोचरम् ।
श॒द्धं स्वजातिमात्रत्वात् अबद्धं निरुपाधितः ॥120॥
अन्वयार्थ : [व्यतिरेक: अरित] व्यतिरेक दृष्टान्त इसप्रकार है [यथा] जैसे कि [स्वं आत्मविज्ञानं] अपनी आत्मा का ज्ञान [परहेतुत] केवल मोहादि कर्म के निमित्त से ही [मिथ्यावस्थाविशिष्टं स्यात्] मिथ्यात्व रूप दशा से युक्त रहता है क्योंकि [यत्] जो ज्ञान [एवं न] कर्मों से आवृत नहीं होता है [तत्] वह ज्ञान [शुद्ध एवं] शुद्ध ही रहता है ।
[तद्यथा] उक्त कथन का खुलासा इसप्रकार है कि [सार्थं सर्वार्थगोचर] युगपत् सर्व पदार्थों को विषय करनवाला [क्षायिक ज्ञान] क्षायिक ज्ञान [स्वजातिमात्रत्वात्] केवल स्वाभाविक ज्ञान होने से [शुद्धं] शुद्ध है और [निरुपाधितः अबद्धं] रागादिरूप उपाधि से रहित होने के कारण अबद्ध है ।