
क्षायोपशमिक ज्ञानमक्षयात्कर्मणां सताम् ।
आत्मजातेश्च्युतेरेतद्वन्द्वं चाशुद्धमक्रमात् ॥121॥
अन्वयार्थ : [क्षायोपशमिक ज्ञानं] मतिज्ञान आदि चार क्षायोपशमिक ज्ञान [सतां कर्मणां अक्षयात्] सत्ता में रहनेवाले सर्वघाति स्पर्धकों के क्षय न होने से [आत्मजाते: च्युते:] स्वाभाविक ज्ञानरूप आत्मजाति से च्युत हो जाता है इसालिए [एतत्] ये सब [चाशुद्धमक्रमात्] एक साथ बद्ध और अशुद्ध कहे जाते हैं ।