+ सोपाधि और निरुपाधि रूप कल्पना के नहीं मानने में दोष -
नस्याच्छुद्धं तथाऽशुद्धं ज्ञानं चेदिति सर्वतः ।
न बन्धो न फलं तस्य बन्धहेतोरसंभवात्‌ ॥122॥
अथचेद्बन्धस्तदा बन्धो बन्धो नाऽबन्ध एव यः ।
न शेषश्चिद्विशेषाणां निर्विशेषादबन्धभाक् ॥123॥
माभूदवा सर्वतो बन्धः स्यादबन्धप्रसिद्धितः ।
नाबन्धः सर्वतः श्रेयान्‌ बन्‍धकार्योपलब्धितः ॥124॥
अन्वयार्थ : [नस्याच्छुद्धं तथाऽशुद्धं ज्ञानं] ज्ञान सर्वथा शुद्ध और अशुद्ध नहीं होता है [इति चेत्‌] यदि ऐसा कहो तो [तस्य] उस (ज्ञान) के [बन्धहेतोरसंभवात्‌] बन्‍ध के कारण का [असंभवात्‌] अभाव होने से [बन्धः न] बन्ध नहीं होगा तथा [फल न] उस बन्ध का फल भी सिद्ध नहीं होगा ।
[अथ] अथवा [बन्ध चेत्‌] यदि बन्‍ध होगा [तदा] तो [यः बन्ध] जो बन्ध है [सः बन्ध: एव] वह बन्ध ही रहेगा [अबन्धः न] अबन्ध नहीं होगा क्योंकि [चिद्विशेषाणां निर्विशेषात्] चेतना की पर्यायों में किसी प्रकार का अन्तर न रहने से [अबन्धभाक्‌ शेष: न] अमुक अवस्था में बन्‍ध नहीं होता है ऐसी कोई विशेषता न रहेगी (सब अवस्थाओं मे बन्ध होता ही रहेगा)