+ अबद्ध और बद्ध ज्ञान -
अस्तिचित्सार्थसर्वार्थसाक्षात्कार्यविकारभुक् ।
अक्षयि क्षायिकं साक्षादबद्धं बन्‍धव्यत्ययात् ॥125॥
बद्ध: सर्वोपि संसारकार्यत्वे वैपरीत्यतः ।
सिद्धं सोपाधि तद्भेतोरन्यथानुपपत्तितः ॥126॥
सिद्धमेतावता ज्ञानं सोपाधि निरुपाधि च ।
तत्राशुद्धं हि सोपाधि शुद्धं तन्निरुपाधि यत्‌ ॥127॥
अन्वयार्थ : [बन्‍धव्यत्ययात्] बन्ध के अभाव होने से [चित्सार्थसर्वार्थसाक्षात्कारि] आत्मा और सर्व पदार्थों को युगपत जानने वाला [अविकारभुक्] निर्विकार [अक्षयि] अनन्त [क्षायिकं] क्षायिक और [साक्षात्] पदार्थों (स्व-पर) को प्रत्यक्ष करनेवाला ज्ञान [अबद्धं अस्ति] अबद्ध कहलाता है ।
[संसारकार्यत्वे वैपरीत्यतः] संसाररूप कार्य के होते हुए विपरीतता पाई जाती है इसलिए [बद्ध: सर्वोपि] सब ही संसारी जीव कर्मों से बन्धे हुए हैं अत: उनका ज्ञान [सिद्धं सोपाधि] कर्मरूप उपाधि-सहित सिद्ध होता है [तद्भेतोरन्यथानुपपत्तितः] यदि ऐसा नहीं होता तो संसाररूप कार्य के होते हुए बन्ध के कारण से उत्पन्न होनेवाली जो जीव के स्वभाव की विपरीतता पाई जाती है, वह नहीं पाई जानी चाहिए ।
[एतावता] इस प्रकार से [ज्ञानं सोपाधि निरुपाधि च सिद्धं] ज्ञान सोपाधि और निरूपाधि सिद्ध होता है [तत्र हि यत्] उनमें से निश्चय से जो (ज्ञान) [अशुद्धं सोपाधि] अशुद्ध है वह सोपाधि है [शुद्ध तत् निरुपाधि] और जो शुद्ध (ज्ञान) है वह निरूपाधि है ।