
कार्यरूपः स बन्धोस्ति कर्मणां पाकसंभवात् ।
हेतुरूपमशुद्धत्वं तन्नवाकर्षणत्वतः ॥132॥
अन्वयार्थ : [कर्मणां पाकसंभवात्] कर्मों के उदय से होने से [कार्यरूपः स बन्धोस्ति] वह बंध कार्यरूप है और [तन्नवाकर्षणत्वतः] उनके द्वारा ही नवीन कर्मों का आकर्षण होकर बंध होने से [हेतुरूपमशुद्धत्वं] अशुद्धता कारणरूप है ।