जीव: शुद्धनयादेशादस्ति शुद्धोपि तत्त्वतः ।
नासिद्धश्चाप्यशुद्धोपि बद्धाबद्धनयादिह ॥133॥
अन्वयार्थ : [तत्वतः] वास्तव में [इह] यहां पर [जीव: शुद्धनयादेशादस्ति शुद्धोपि] शुद्ध निश्चयनय की अपेक्षा से जीव शुद्ध भी है [अपि च] और [बद्धाबद्धनयात्‌] कथंचित बद्धाबद्ध नय (व्यवहारनय) से जीव [अशुद्ध अपि] अशुद्ध है यह भी [असिद्ध न] असिद्ध नहीं है ।