वाच्य: शुद्धनयस्यास्य शुद्धो जीवश्चिदात्मकः ।
शुद्धादन्यत्र जीवाद्या: पदार्थास्ते नव स्मृताः ॥135॥
अन्वयार्थ : [अस्य शुद्धनयस्य] इस शुद्धनय का विषय [चिदात्मक: शुद्ध: जीव: वाच्य:] चेतनात्मक शुद्ध जीव कहना चाहिये कारण [शुद्धात्‌ अन्यत्र] व्यवहारनय के विषय-स्वरूप [ते जीवाद्या:] वे जीव आदि [नवपदार्थो स्मृता] नौ पदार्थ कहे गये हैं ।