
सत्यं शुद्धनयः श्रेयान् न श्रेयानितरो नयः ।
अपि न्यायबलादस्ति नयः श्रेयानिवेतर: ॥137॥
अन्वयार्थ : [सत्य] ठीक है कि [शुद्धनय: श्रेयान्] शद्धनय ही उपादेय है [इतरः नयः श्रेयान् न] दूसरा उपादेय नहीं है [अपि] किन्तु फिर भी [न्यायबलात्] न्यायबल से अर्थात युक्ति-युक्त का होने के कारण [इतर: नयः] व्यवहारनय [श्रेयान् इव अस्ति] शुद्धनय के समान उपादेय है ।