
तद्यथानादिसन्तानबन्धपर्यायमात्रतः ।
एक विवक्षितो जीव: स्मृता नव पदा अमी ॥138॥
अन्वयार्थ : [तद्यथा] पूर्वोक्त कथन का खुलासा इसप्रकार है कि [एक: जीव] एक ही जीव [अनादिसन्तानबन्धपर्यायमात्रत] केवल अनादिसन्तान के क्रम से होनेवाले बन्ध के पर्याय की अपेक्षा से [विचक्षित: सन्] विवक्षित होकर जीव के [अमी नवपदा: स्मृता] इन जीव आदि नव पदार्थरूप कहा जाता है ।