
किंच पर्यायधर्माणो नवामी पदसंज्ञकाः ।
उपरक्तिरुपाधि: स्यान्नात्र पर्यायमात्रता ॥139॥
अन्वयार्थ : [किं च] तथा [अमी नवपदसंज्ञका:] ये नव पदार्थ [पर्यायधर्माणः] पर्याय के धर्म है और [अत्र] इनमें [पर्यायमात्रता न] केवल पर्यायरूपता नहीं है किंतु [उपरक्ति उपाधि: स्यात्] उपरक्तिरूप उपाधि भी है ।उपाधि : जो साधन के साथ तो नियम से न रहे केन्तु साध्य के साथ नियम से रहे । जैसे 'यह पर्वत धूमवान है क्योंकि यहाँ पर अग्नि है' यहाँ पर गीला इंधन उपाधि है, क्योंकि गीला इंधन साधनरूप अग्नि के साथ नियम से नहीं रहता है, किन्तु साध्यभूत धूम के साथ अवश्य रहता है ।