
नात्रासिद्धमुपाधित्वं सोपरक्तेस्तथा स्वतः ।
यतो नवपदव्याप्तमव्याप्तं पर्ययेषु तत् ॥140॥
अन्वयार्थ : [अत्र] जीव आदि नव पदार्थों में [स्वतः] अनादिकालीन [तथा] वैसे [सोपारक्ते: उपाधित्वं] सोपरक्ति की उपाधिता [असिद्धं न] असिद्ध नहीं है [यतः] क्योंकि [तत् पर्यायेषु अव्याप्त] वह उपाधिता 'व्यापक' जीव की सम्पूर्ण पर्यायों में अव्याप्त और [नवपदव्याप्त] नव पदों में व्याप्त है ।