+ शंका -- शुद्ध-नय ही कहना चाहिए, व्यवहारनय नहीं -
ननूपरक्तिरस्तीति किंवा नास्तीति तत्वतः ।
उभयं नोभयं किंवा तत्क्रमेणाक्रमेण किम् ॥142॥
अस्तीति चत्तदा तस्यां सत्यां कथमनादरः ।
नास्तीति चेदसत्त्वेस्या: सिद्धो नानादरो नयात् ॥143॥
सत्यामुपरक्तौ तस्यां नादेयानि पदानि वै ।
शुद्धादन्‍यत्र सर्वत्र नयस्यानधिकारत: ॥144॥
असत्यामुपरक्तौ वा नैवामूनि पदानि च ।
हेतुशून्याविनाभूतकार्यशून्यस्य दर्शनात् ॥145॥
उभयं चेक्रमेणेह सिद्धं न्‍यायाद्विवक्षितम् ।
शुद्धमात्रमुपादेयं हेयं शुद्धेतरं तदा ॥ 143॥
यौगपद्येपि तद्-द्वैतं न समीहितसिद्धये ।
केवलं शुद्धमादेयं नादेयं तत्परं यतः ॥147॥
नैकस्यैकपदे स्तो द्वे क्रिये वा कर्मणी ततः ।
यौगपद्यमसिद्धं स्याद्-द्वैताद्वैतस्य का कथा ॥148॥
ततोऽनन्यगतेर्न्यायाच्छुद्व: सम्यक्त्वगोचर: ।
तद्वाचकश्च य: कोपि वाच्यः शुद्धनयोपि स: ॥149॥
अन्वयार्थ : [ननु] शंकाकार का कहना है कि [उपरक्ति अस्ति इति] उपरक्ति है [किंवा] अथवा [नास्ति इति] नहीं है [किंवा] अथवा [तत्क्रमेण उभय] अस्तित्व नास्तित्व के क्रम से उभयरूप है [किं] अथवा क्या [अक्रमेण उभयं न] युगपत्‌ उपयरूप नहीं है ।
[अस्ति इति चेत्‌] यदि जीवादिक पदार्थों में उपरक्ति का सद्भाव मानते हो [तदा] तो [तस्थां सत्यां] उसका सद्भाव होने पर [अनादर कथं] उसका अनादर कैसे होगा (यदि जीवादिक नव पदार्थ में रहनेवाली उपरक्ति वास्तविक है तो जीव आदि नव पदार्थरूप ही जीव का स्वरूप क्‍यों नही मान लिया जाता) [नास्ति इति चेत्‌] यदि उन उपरक्ति का सद्भाव वास्तव में नहीं है तो [अस्या असत्त्वे] इसका असद्भाव होने पर [नयात्‌ अनादरः न सिद्ध:] न्यायानुसार उसका अनादर सिद्ध नहीं हो सकता है (क्योंकि जो पदार्थ खरविषाण के समान अभावरूप होते है उसका अनादर किस प्रकार किया जा सकता है । कारण कि आदर अनादर सद्भावात्मक पदार्थ का ही होता है अभावात्मक पदार्थ का नहीं)
[वै] निश्चय से [तस्यां उपरक्तौ सत्याम्] उस उपरक्ति के सद्भावात्मक होने पर शुद्धनय से [पदानि आदेयानि न] जीवादिक नव पदार्थ उपादेय नहीं ठहरते हैं (वे जीव के नवपद नहीं कहे जा सकते हैं) क्योंकि [शुद्धात्‌ अन्यत्र सर्वत्र] शुद्ध-दव्य को छोड करके अशुद्व सम्पूर्ण द्रव्यों में ['अस्य' नयस्‍य अनधिकारतः] इस शुद्वनयय का अधिकार नहीं है (शुद्ध निश्चय नय अशुद्ध द्रव्य का ग्रहण नहीं करता है)
[वा] अथवा [असत्यामुपरक्तौ] उप्रक्ति का अभाव मानने पर [नैवामूनि पदानि च] ये नव पद ही नहीं बन सकेंगे क्योंकि [हेतुशून्याविनाभूतकार्यशून्यस्य दर्शनात्] हेतु के अभाव में अविनाभाव रखनेवाले कार्य का भी अभाव देखा जाता है ।
[इह] इन (जीवादिक नव पदों) में [क्रमेण उभयं विवक्षितं सिद्ध चेत्‌] यदि क्रमपूर्वक उपरक्ति का सद्भाव और असद्भावरूप उभय विवक्षित सिद्ध हो [तदा] तो [न्‍यायात्‌] न्यायानुसार [शुद्धमात्र उपादेय] केवल शुद्धांश उपादेय और [शुद्धेतरं हेय] अशुद्धंश हेय ठहरेगा ।
[यौगपद्ये] उन दोनों के युगपत होने पर [अपि तद्-द्वैतं] उन (उपरक्ति और अनुपरक्ति) का द्वैतरूप भंग ही [न समीहितसिद्धये] अभीष्ट सिद्धि के लिए समर्थ नहीं हो सकता है [यत:] क्योंकि [केवलं शुद्धमादेयं] केवल उपरक्ति रहित शुद्धांश उपादेय होगा और [नादेयं तत्परं] उससे विपरीत (उपरक्ति रहित) अशुद्धांश उपादेय नहीं होगा ।
[एकस्यैकपदे] एक द्रव्य के एक पद में [द्वे क्रिये वा कर्मणी नस्त:] दो क्रियाएं अथवा दो कर्म नहीं हो सकते हैं [तत:] इसलिए जब [यौगपद्यं असिद्धं स्यात्] (उपरक्ति और अनुपरक्ति का) यौगपद्य ही सिद्ध नहीं हो सकता है तो फिर [द्वैताद्वैतस्य का कथा] द्वैताद्वैत का विचार ही कैसे किया जा सकता है ?
[तत] इसलिए [न्यायात्] न्यायानुसार [अनन्यगते:] और कोई गति न रहने से [सम्यक्त्वगोचर:] यथार्थ का विषयभूत [शुद्ध:] उप्रक्ति-रहित द्रव्य ही शुद्ध है [च] और [तद्वाचकश्च य: कोपि] उस शुद्ध द्रव्य का वाचक हो कोई भी नय है [वाच्यः शुद्धनयोपि स:] वह शुद्धनय ही वक्तव्य है (शुद्ध द्रव्य तथा उसका वाचक शुद्ध नय ही कहना चाहिए, अशुद्ध-द्रव्यरूप जीवादिक नव-पदार्थ व उनका वाचक व्यवहार-नय नहीं कहना चाहिए ।